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          सम्पूर्ण विश्व का एक मात्र मन्दिर

जहाँ फरवरी 1992 में प्रतिष्ठा मुहूर्त के 10 मिनट पूर्व माँ चक्रेष्वरी ने भविष्यवाणी की है कि यह मन्दिर पालीताना के समतुल्य है और पालीताना के समतुल्य तीर्थ होगा। तद्ष्चात यहाँ अदृष्य शक्ति के संकेत अनुसार 18 जून, 1993 से 28 अखण्ड ज्योति दीपक (27 शुद्ध घी व एक मूंगफली के तेल से) चैबीस घण्टे(त्वनदक जीम ब्सवबा) प्रज्वलित है।

विस्मय है – इन सभी 28 अखण्ड ज्योतियों में जून 1993 से काले काजल की अपेक्षा पीला चंदन एवं नवम्बर 2008 से इन ज्योतियों में केसर की पंखुडियाँ झूलती हुई दिखाई देने लगी हैं।

अतिविस्मय है – मूंगफली के तेल से प्रज्वलित एक ज्योति में अत्यन्त केसरिया रंग का चंदन एकत्रित होता है। जबकि घी के दीपक की अपेक्षा तेल का दीपक सर्वाधिक काला होना चाहिए।

अति अति विस्मय – जहाँ कई ज्योतियों में जून, 2009 से सफेद चंदन एकचित्र होता है। सफेद चंदन की ज्योति न तो कभी किसी ने सुनी है और न ही देखी है।

सफेद चंदन की अद्भुत महिमा

अ) वैदिक धर्म षास्त्रोंनुसार – सफेद चंदन के वृक्ष-जंगल केवल देवलोक में ही उपलब्ध है। देवलोक में देवता भगवान षिव की पूजा सदैव सफेद चंदन से किया करते हैं। यही कारण है कि पृथ्वीलोक में भगवान षिव पर ऊँ की आकृति सफेद रंग में ही अंकित की जाती है।

ब) जैन मतानुसार – सफेद चंदन के वृक्ष-जंगल देवलोक में मल्यागिरी पर्वत में है। इसी जंगल में माँ चक्रेष्वरी का निवास है और इस मंदिर में प्रभु केसरिया कुंथुनाथ से माँ चक्रेष्वरी का अति विषेष लगाव आभास किया जाता रहा है।